राज्य सरकार के व्यवस्था परिवर्तन से प्रदेश के शिक्षकों के दिमाग में पैदा किया केमिकल लोचा , परीक्षा लेने वाले ही हो गए परीक्षा देने की कतार में हो खड़े
प्रदेश में सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में चल रही राज्य सरकार ने शुरू से व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर कई प्रयोग किए जिनमें कुछ सीधे तो कुछ उल्टे पड़े । अब एक नया प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में किया जा रहा जिसमें प्रदेश के 132 स्कूलों को सीबीएसई सब कैडर के तहत लाया जा रहा है जबकि अन्य सभी स्कूल पूर्व की तरह हिमाचल बोर्ड में ही रहेंगे इस तरह से राज्य सरकार दो अलग – अलग बोर्ड एक साथ चलाएगी । इस व्यवस्था परिवर्तन ने सबसे ज़्यादा मुश्किलें देश के भविष्य को सुधारने वाले शिक्षक वर्ग के सामने ही खड़ी कर दी है । शिक्षकों के लिए सबसे हैरानी इस बात की है कि जब वे अपनी मेहनत और काबलियत के दम पर पूर्व में उतीर्ण की गई परीक्षा के आधार पर शिक्षक के पद पर आसीन हुए हैं तो फिर व्यवस्था परिवर्तन की ये पुनर्परीक्षा की गाज उन पर क्यों गिराई जा रही है । क्या इससे पहले किसी और वर्ग में ऐसी कोई शर्त कभी रखी गई है । यहां तक कि एच ए एस को आई ए एस में पदोन्नति पाने तक के लिए कोई टेस्ट या कोई परीक्षा नहीं होती है तो फिर शिक्षक क्यों दे ये अग्नि परीक्षा । शिक्षक वर्ग का मानना है कि अगर कुछ नया पन लाया भी जा रहा है तो शिक्षकों की परीक्षा लेने की बजाए प्रशिक्षण दिया जाए या कार्यशालाओं को आयोजित कर उन्हें उनकी नई ज़िम्मेदारी के लिए तैयार किया जाए । इस पर शिक्षक शिक्षा व्यवस्था को लेकर इन दिनों एक नई स्थिति चर्चा का विषय बनी हुई है। एक ओर राज्य शिक्षा विभाग शिक्षकों के सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों में समायोजन/तैनाती के लिए पात्रता परीक्षण लेने पर अड़ा हुआ है, वहीं दूसरी ओर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने कई शिक्षकों को मान्यता प्रदान करते हुए उन्हें शिक्षक कोड / नंबर भी आवंटित कर दिए हैं। इतना ही नहीं, सीबीएसई द्वारा उन्हीं शिक्षकों की बोर्ड परीक्षाओं की मूल्यांकन (इवैलुएशन) ड्यूटी भी लगाई जा रही है।
इस दोहरी प्रक्रिया ने शिक्षकों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। शिक्षकों का कहना है कि जब सीबीएसई उन्हें मान्यता देकर मूल्यांकन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों की जिम्मेदारी सौंप रहा है, तो राज्य स्तर पर अलग से टेस्ट लेने की आवश्यकता पर पुनर्विचार होना चाहिए। उनका तर्क है कि इससे न केवल मानसिक दबाव बढ़ रहा है, बल्कि प्रशासनिक समन्वय की कमी भी उजागर हो रही है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति में स्पष्ट नीति और समन्वय की आवश्यकता है, ताकि शिक्षकों को अनावश्यक भ्रम और दबाव का सामना न करना पड़े। उनका सुझाव है कि राज्य शिक्षा विभाग और सीबीएसई के बीच संवाद स्थापित कर एक समान और पारदर्शी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों में यह मुद्दा शिक्षकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार और सीबीएसई इस विषय पर किस प्रकार सामंजस्य स्थापित करते हैं, ताकि शिक्षा व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित हो सके।
