अंतर्राष्ट्रीय समाज सेवी व धार्मिक संस्था आर्ट ऑफ लिविंग को 10 साल बाद मिला इंसाफ, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को सुप्रीम झटका -अनुचित तरीके से लिए 5 करोड़ रुपए संस्था को करने होंगे वापिस
सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्त्वपूर्ण निर्णय के साथ आर्ट ऑफ लिविंग के प्रतिष्ठित 2016 वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल को लेकर लगभग एक दशक से चले आ रहे मीडिया ट्रायल और निराधार आरोपों का पटाक्षेप हो गया है। न्यायालय ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के पूर्व निर्णय को निरस्त करते हुए उससे संबंधित सभी परिणामी अंतरिम कार्रवाइयों को भी समाप्त कर दिया है।
निर्णय का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना कि अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों से यह सिद्ध होता है कि आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल से यमुना के बाढ़ क्षेत्र को किसी प्रकार की पर्यावरणीय क्षति नहीं हुई थी।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा जमा की गई ₹5 करोड़ की राशि उसे पूर्णतः वापस की जानी चाहिए। इस राशि को अनुचित रूप से ‘जुर्माना’ के रूप में प्रचारित किया गया था, जिसका उद्देश्य संस्था की प्रतिष्ठा को धूमिल करना था।
2016 का वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल एक ऐतिहासिक वैश्विक आयोजन था, जिसमें 155 से अधिक देशों की सहभागिता रही और लगभग 35 लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से इसमें सम्मिलित हुए। इस विराट आयोजन की अध्यक्षता भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर. सी. लाहोटी ने की थी। संयुक्त राष्ट्र के छठे महासचिव दिवंगत डॉ. बुतरस बुतरस-घाली भी इस आयोजन के सह-अध्यक्ष बनने वाले थे, किंतु दुर्भाग्यवश आयोजन से एक माह पूर्व ही उनका निधन हो गया।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के पश्चात आर्ट ऑफ लिविंग के आधिकारिक प्रवक्ता ने कहा:
“निहित स्वार्थों से प्रेरित कुछ लोगों द्वारा उस संस्था पर निराधार आरोप लगाने का यह दुर्भाग्यपूर्ण और हास्यास्पद प्रयास अब पूरी तरह उजागर हो गया है, जो स्वयं लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के संवर्धन के लिए समर्पित भाव से कार्य करती आ रही है।”
