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हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ (हपुट्टा) ने प्रदेश सरकार द्वारा ए और बी श्रेणी के कर्मचारियों के वेतन में प्रतिमाह तीन प्रतिशत कटौती के बजटीय प्रस्ताव की कड़ी आलोचना की है । संघ ने इस निर्णय को न केवल कर्मचारी विरोधी बल्कि तानाशाही रवैये का स्पष्ट उदाहरण बताया है। हपुट्टा का मानना है कि यह कदम कर्मचारियों के हितों पर सीधा प्रहार है और इससे प्रदेश में कार्यरत शिक्षकों एवं अन्य कर्मचारियों के मनोबल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

संघ के महासचिव डॉ. नितिन व्यास ने कहा कि वर्तमान समय में जब महंगाई लगातार बढ़ रही है और आम कर्मचारी अपने परिवार का भरण-पोषण करने में कठिनाइयों का सामना कर रहा है, ऐसे में वेतन में कटौती का निर्णय लेना पूरी तरह असंवेदनशीलता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि सरकार को कर्मचारियों को राहत देने के उपाय करने चाहिए थे, न कि उनके वेतन में कटौती कर उन्हें और अधिक आर्थिक संकट में धकेलना चाहिए।

डॉ. व्यास ने यह भी कहा कि प्रदेश सरकार पर पहले से ही कर्मचारियों का लंबित 13 प्रतिशत महंगाई भत्ता (डीए) जारी करने की जिम्मेदारी है, जिसे लंबे समय से रोका गया है। यह भत्ता कर्मचारियों का वैधानिक अधिकार है और इसे शीघ्र जारी किया जाना चाहिए। इसके विपरीत सरकार का वेतन कटौती का निर्णय कर्मचारियों के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार को दर्शाता है। यह स्थिति कर्मचारियों में असंतोष को बढ़ावा दे रही है और सरकार के प्रति विश्वास को कमजोर कर रही है।

हपुट्टा ने 2016 के यूजीसी वेतनमान (UGC Scale) के एरियर के मुद्दे को भी गंभीरता से उठाया है। संघ ने कहा कि देश के लगभग सभी राज्यों में शिक्षकों को इस एरियर का भुगतान किया जा चुका है, जबकि हिमाचल प्रदेश में यह अब तक लंबित है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रदेश के शिक्षक अपने वैधानिक अधिकारों से वंचित हैं और वर्षों से इसके लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह न केवल प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है, बल्कि शिक्षकों के साथ भेदभावपूर्ण रवैये को भी उजागर करता है।

संघ का कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत शिक्षक समाज के निर्माण की आधारशिला होते हैं। वे न केवल विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करते हैं, बल्कि समाज में नैतिक मूल्यों और जिम्मेदार नागरिकता का भी विकास करते हैं। ऐसे में यदि शिक्षकों के आर्थिक और पेशेवर हितों की अनदेखी की जाती है, तो इसका सीधा प्रभाव शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ेगा, जो प्रदेश के दीर्घकालिक विकास के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।

डॉ. नितिन व्यास ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हपुट्टा इस प्रकार के कर्मचारी विरोधी निर्णयों को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की कि वह तत्काल प्रभाव से वेतन में तीन प्रतिशत कटौती के निर्णय को वापस ले और कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए सकारात्मक कदम उठाए। इसके साथ ही, लंबित 13 प्रतिशत डीए को बिना किसी और देरी के जारी किया जाए तथा 2016 यूजीसी वेतनमान के एरियर का भुगतान शीघ्र सुनिश्चित किया जाए।

संघ ने यह भी कहा कि यदि सरकार कर्मचारियों की जायज मांगों की अनदेखी करती रही, तो प्रदेश के शिक्षक और कर्मचारी वर्ग एकजुट होकर व्यापक आंदोलन के लिए बाध्य होगा। हपुट्टा ने स्पष्ट किया कि वह लोकतांत्रिक तरीके से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करेगा और आवश्यकता पड़ने पर अन्य कर्मचारी संगठनों के साथ मिलकर संयुक्त रूप से आंदोलन की रणनीति तैयार करेगा।

हपुट्टा ने प्रदेश के सभी शिक्षक संगठनों, कर्मचारी संघों और बुद्धिजीवी वर्ग से अपील की कि वे इस मुद्दे पर एकजुटता दिखाएं और सरकार पर दबाव बनाएं, ताकि कर्मचारियों के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके। संघ का मानना है कि यह केवल शिक्षकों का मुद्दा नहीं है, बल्कि प्रदेश के समस्त कर्मचारी वर्ग के अधिकारों से जुड़ा हुआ प्रश्न है।

अंत में, डॉ. नितिन व्यास ने प्रदेश सरकार से पुनः आग्रह किया कि वह अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करे और कर्मचारियों के हितों के अनुरूप नीतियां बनाए। उन्होंने कहा कि सरकार और कर्मचारियों के बीच विश्वास और सहयोग का वातावरण बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। यदि सरकार अपने कर्मचारियों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करेगी, तभी प्रदेश के विकास और प्रगति के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

हपुट्टा ने आशा व्यक्त की कि सरकार शीघ्र ही इस मुद्दे पर सकारात्मक निर्णय लेगी और कर्मचारियों को राहत प्रदान करेगी। अन्यथा, संघ अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक संघर्ष का मार्ग अपनाने के लिए बाध्य होगा।

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