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कोरियाई हार्ट से लेकर रात 2 बजे तक चलने वाली अतिशय सोच, ‘सिचुएशनशिप’ से लेकर ‘सोलमेट’ तक – Gen Z के हर सवाल का गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर ने दिया उत्तर

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आज एक आत्मीय और जीवंत संवाद में भारत के IIT, IIM, NIT और AIIMS जैसे 1300 से अधिक प्रतिष्ठित संस्थान व उच्च शिक्षण संस्थानों के हजारों प्रथम-वर्षीय विद्यार्थियों ने वैश्विक मानवतावादी एवं आध्यात्मिक गुरु गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर के साथ संवाद किया।
विद्यार्थियों ने अपने मन के अनेक प्रश्न खुले तौर पर उनके सामने रखे—लोकप्रिय कोरियाई हार्ट इमोजी के अर्थ से लेकर उस अंतहीन विचार-श्रृंखला तक, जो आज के अनेक युवा मनों को रात के दो बजे तक जगाए रखती है। जब एक विद्यार्थी ने पूछा कि जीवन में ‘सिचुएशनशिप’ चुननी चाहिए या ‘सोलमेट’ की तलाश करनी चाहिए, तो गुरुदेव ने प्रश्न को एक नई दृष्टि दे दी। उन्होंने पूछा—“अपने आपको उस दूसरे व्यक्ति के स्थान पर रखकर देखिए। यदि आप किसी को अपना जीवनसाथी चुनें और वह आपको केवल एक ‘सिचुएशनशिप’ के रूप में देखना चाहे, तो आपको कैसा लगेगा? तब आप क्या चुनेंगे?” कश्मीर की एक छात्रा ने अपने जीवन की एक और गहरी उलझन साझा की। उसने कहा कि जीवन में सब कुछ ठीक होते हुए भी भीतर एक प्रकार की निरर्थकता का अनुभव होता है। गुरुदेव ने अत्यंत आत्मीयता से कहा कि उसका प्रश्न आज पूरी दुनिया के युवाओं के भीतर चल रहे एक व्यापक संघर्ष को अभिव्यक्त करता है। उन्होंने अकेलेपन से बाहर निकलने और जीवन में पुनः अर्थ एवं उद्देश्य खोजने के लिए एक अत्यंत सरल और अंतरंग माध्यम—श्वास—की ओर संकेत किया।

यह संवाद आर्ट ऑफ लिविंग के यूथ डेस्क द्वारा आयोजित सातवें नेशनल इंडक्शन प्रोग्राम National Induction Programme के दौरान हुआ। यह कार्यक्रम उस पीढ़ी को एक साथ लेकर आया, जो तकनीक के कारण पहले से कहीं अधिक जुड़ी हुई है, फिर भी भीतर से अपनत्व, जीवन के अर्थ और मानसिक स्थिरता की तलाश में है।

लेकिन इस पूरे संवाद में जो बात विद्यार्थियों के मन में सबसे अधिक अंकित हुई, वह थी गुरुदेव की सहज जिज्ञासा, उनका विनोदपूर्ण अंदाज़ और उस पीढ़ी को समझने तथा उससे सीखने की उनकी तत्परता, जो कठिन से कठिन प्रश्न पूछने से नहीं हिचकती। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे उन गुणों को कभी न खोएँ, जो युवावस्था को जीवंत बनाते हैं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा—“शरारती बने रहिए। यही युवावस्था की पहचान है।” साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा—“आप गतिशील और शरारती अवश्य रहें, लेकिन आपकी शरारत किसी दूसरे के लिए पीड़ा का कारण नहीं बननी चाहिए।”

विद्यार्थियों को “इस दुनिया की वास्तविक संपदा” बताते हुए गुरुदेव ने उन्हें उनकी असाधारण संभावनाओं का स्मरण कराया। उन्होंने कहा कि दुनिया में जहाँ भी उत्कृष्ट प्रतिभाएँ दिखाई देती हैं, वहाँ कम-से-कम एक भारतीय अवश्य मिलता है। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कंप्यूटर विज्ञान, फैशन और हॉस्पिटैलिटी जैसे विविध क्षेत्रों में विश्वभर में अपनी पहचान बना रहे भारतीय युवाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उपलब्धियों से भी अधिक आवश्यक एक गुण है—“बाहर से दृढ़ और भीतर से लचीला व्यक्तित्व।”

उनके अनुसार, दृढ़ता का अर्थ यह नहीं कि जीवन में असफलता या संदेह कभी आए ही नहीं; बल्कि इसका अर्थ है—असफलताओं और अनिश्चितताओं के बावजूद निरंतर आगे बढ़ते रहना।
उन्होंने कहा—“जो लोग आरंभ में असफल होते हैं, उनमें से भी अनेक आगे चलकर महान उद्यमी बनते हैं। इसलिए स्वयं पर विश्वास रखिए।” और जब बात अपने निर्णयों को लेकर उठने वाले संदेह की आई, तो उन्होंने एक अत्यंत महत्वपूर्ण दृष्टिकोण रखा—“संदेह होना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन उसे अपने भीतर इतना गहरा मत उतरने दीजिए कि वही आपकी पहचान बन जाए।”

आज के युवाओं के जीवन में ध्यान और एकाग्रता का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। छोटे-छोटे वीडियो और निरंतर डिजिटल उत्तेजना की आदी होती जा रही पीढ़ी के संदर्भ में गुरुदेव ने कहा—“आज ध्यान की कमी बहुत सामान्य हो गई है। पहले ध्यान की अवधि 40-50 मिनट हुआ करती थी, आज यह केवल 30 सेकंड रह गई है।” इसका समाधान उन्होंने भीतर के तनाव को दूर करने में देखा। उनके अनुसार, “जब व्यक्ति भीतर से तनावमुक्त होता है, तो उसके भीतर ऊर्जा का संचार होता है और उसकी एकाग्रता भी स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।”

युवाओं की भावनात्मक उलझनों पर बात करते हुए गुरुदेव ने अपने विशिष्ट हास्यबोध का भी सहारा लिया। उन्होंने कहा—“जीवन में थोड़ा हास्य रखिए।” उन्होंने स्मरण कराया कि क्रोध वह दंड है जो स्वयं को दिया जाता है। जब क्रोध उठे, तो कुछ गहरी साँसें लें, परिस्थिति से थोड़ा पीछे हटें, स्वयं को देखें—और संभव हो तो उसी परिस्थिति को हास्य में बदल दें।

सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में उन्होंने युवाओं को विवेकपूर्ण दृष्टि अपनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा—“सोशल मीडिया पर जो कुछ भी आता है, उसे सच मत मान लीजिए। बहुत-सी चीज़ें झूठी होती हैं और आज उनमें से बहुत कुछ AI द्वारा निर्मित भी है।”

FOMO, फ़ोमो—अर्थात दूसरों से पीछे छूट जाने का भय—रिश्तों और निरंतर आगे बढ़ते रहने के सामाजिक दबाव के बीच गुरुदेव ने मित्रता की एक अत्यंत सुंदर और सरल परिभाषा दी।
उन्होंने कहा—“अच्छा मित्र वह है, जिसके साथ बात करके आप फ़ोमो से बाहर आ जाएँ। आप ज़ोमो में जिएँ और दूसरों को फ़ोमो दें।” उनके इस सहज और चुटीले कथन पर पूरा सभागार तालियों और हँसी से गूँज उठा।

शायद इस पूरे संवाद का सबसे गहरा संदेश यही था कि युवाओं को अपनी महत्वाकांक्षाएँ कम करने, प्रश्न पूछना छोड़ने या अपने साहस और जिज्ञासा को दबाने की आवश्यकता नहीं है।
युवा होना जीवन से प्रश्न पूछना है। युवा होना नई राहों पर चलने का साहस है। युवा होना गिरकर फिर उठ खड़े होने की क्षमता है और सबसे बढ़कर—युवा होना अपने भीतर की जीवंतता को बनाए रखना है।

गुरुदेव का संदेश स्पष्ट था—सफलता की दौड़ में स्वयं को मत खोइए। प्रश्न पूछिए, सपने देखिए, प्रयोग कीजिए, हँसिए, असफलताओं से सीखिए और सबसे महत्वपूर्ण—अपने भीतर की शांति, ऊर्जा और करुणा को जीवित रखिए।

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