शिमला के गेयटी थिएटर में प्रसिद्ध साहित्यकार एस.आर. हरनोट के उपन्यास ‘नदी-रंग जैसी लड़की’ पर केंद्रित आलोचना पुस्तक का लोकार्पण
शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थिएटर सभागार में रविवार को प्रख्यात कथाकार एस.आर. हरनोट के बहुचर्चित उपन्यास ‘नदी-रंग जैसी लड़की’ पर केंद्रित आलोचना कृति का भव्य लोकार्पण संपन्न हुआ। न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से प्रकाशित और डॉ. राजेंद्र बड़गूजर द्वारा संपादित इस पुस्तक का विमोचन डॉ. राजेंद्र बड़गूजर, वरिष्ठ कवि-आलोचक राकेशरेणु, पत्रकार व साहित्य मीमांसक जय प्रकाश पांडेय और प्रकाशक एम.एम. चंद्रा द्वारा किया गया।










हिमालय साहित्य संस्कृति एवं पर्यावरण मंच द्वारा आयोजित इस समारोह की अध्यक्षता करते हुए एस.आर. हरनोट ने सभी अतिथियों का हिमाचली टोपी, शॉल और मफ़्लर भेंटकर स्वागत किया।
पर्यावरण और विकास के अंतर्विरोधों पर गहन मंथन
- वैश्विक चिंताएं और लोक-संस्कृति: मुख्य संपादक डॉ. राजेंद्र बड़गूजर ने पुस्तक की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि प्रसिद्ध उपन्यासकार डॉ. अब्दुल बिस्मिल्लाह ने इस कृति को महाकाव्य जैसा माना है। यह उपन्यास पहाड़ी जीवन की लोक-संस्कृति, नदी और स्त्री की जिजीविषा के माध्यम से पर्यावरण को हो रहे नुकसान की वैश्विक चिंता को उजागर करता है।
- विकास की अमानवीय भूमिका: जय प्रकाश पांडेय ने कहा कि उपन्यास की नायिका ‘सुनमा दादी’ का जीवन सामान्य नहीं है, और इसे असामान्य बनाने में हमारे तथाकथित विकास की अमानवीय भूमिका रही है।
- अंग्रेजी अनुवाद की तैयारी: प्रो. मीनाक्षी एफ. पॉल ने घोषणा की कि वे इस प्रिय उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद कर रही हैं, क्योंकि यह वर्तमान पर्यावरण विमर्श पर गहराई से बात करता है।
- विरासत बचाने की गुहार: कार्यक्रम के दौरान राकेशरेणु और जयप्रकाश पांडेय ने शिमला प्रशासन और हिमाचल सरकार से अपील की कि शिमला जैसे धरोहर शहर में पेट्रोल और डीजल वाहनों का परिचालन पूरी तरह बंद कर इलेक्ट्रिक और सीएनजी वाहनों को प्राथमिकता दी जाए।
तीन संस्करण और देश भर में पहचान
कार्यक्रम का संचालन कर रहे डॉ. दिनेश शर्मा ने बताया कि वर्ष 2022 में वाणी प्रकाशन की ‘सृष्टि’ सीरीज के तहत प्रकाशित इस उपन्यास के अब तक तीन संस्करण आ चुके हैं। यह बीदर यूनिवर्सिटी (कर्नाटक) के पाठ्यक्रम में शामिल है तथा हाल ही में इसका मलयालम अनुवाद भी संपन्न हुआ है।
इस अवसर पर डॉ. हेमराज कौशिक, जगदीश बाली, डॉ. प्रशांत रमण रवि, अभिषेक तिवारी, और प्रकाशक एम.एम. चंद्रा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सभागार वरिष्ठ साहित्यकारों, शोधार्थियों और पाठकों से खचाखच भरा रहा। अंत में धन्यवाद प्रस्ताव डॉ. सत्यनारायण स्नेही ने प्रस्तुत किया।
