प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ (हपुटवा) ने आज हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद की बैठक का किया कड़ा विरोध, बैठक को बताया राजनीतिक निर्णयों का मंच
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ (हपुटवा) ने आज हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद की बैठक का कड़ा विरोध व्यक्त किया है। संघ का मानना है कि यह बैठक शिक्षकों एवं विश्वविद्यालय हितों की उपेक्षा करते हुए केवल राजनीतिक निर्णयों का मंच बनकर रह गई है। हपुटवा के अध्यक्ष डॉ. नितिन व्यास ने कहा कि प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों—चाहे वे विश्वविद्यालय हों या महाविद्यालय—में कार्यरत हजारों शिक्षक पिछले सात वर्षों से अपने वैधानिक अधिकार, अर्थात् करियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) के अंतर्गत पदोन्नति की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतने लंबे समय से लंबित इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कोई ठोस एवं सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया है।
उन्होंने कहा कि CAS केवल एक पदोन्नति योजना नहीं है, बल्कि यह शिक्षकों के शैक्षणिक विकास, शोध उन्नति और संस्थागत गुणवत्ता को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके बावजूद, प्रदेश में इस योजना को प्रभावी रूप से लागू न करना न केवल शिक्षकों के मनोबल को तोड़ने वाला है, बल्कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है।
डॉ. व्यास ने यह भी कहा कि हिमाचल प्रदेश देश का ऐसा पहला राज्य बन गया है, जहाँ शिक्षकों को उनके वैधानिक अधिकारों से व्यवस्थित रूप से वंचित किया जा रहा है। इससे न केवल शिक्षकों में असंतोष बढ़ रहा है, बल्कि प्रतिभाशाली युवाओं का शिक्षण पेशे से मोहभंग भी हो रहा है।
संघ के महासचिव डॉ. अंकुश भारद्वाज ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में ए एवं बी श्रेणी के कर्मचारियों के वेतन से प्रतिमाह 3 प्रतिशत कटौती का निर्णय पूरी तरह से कर्मचारी विरोधी और तानाशाहीपूर्ण है। उन्होंने कहा कि एक ओर सरकार शिक्षकों एवं कर्मचारियों के वैध आर्थिक अधिकारों को रोके हुए है, वहीं दूसरी ओर उनके वेतन में कटौती कर रही है, जो किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश सरकार अपने बढ़ते हुए राजस्व घाटे को पूरा करने के लिए कर्मचारियों पर आर्थिक बोझ डाल रही है, जो कि निंदनीय है। महंगाई के इस दौर में, जब आम कर्मचारी अपने परिवार का भरण-पोषण करने में कठिनाइयों का सामना कर रहा है, ऐसे निर्णय उनकी समस्याओं को और अधिक बढ़ा रहे हैं।
हपुटवा ने यह भी कहा कि जहाँ एक ओर राजनीतिक वर्ग एवं उच्च प्रशासनिक अधिकारी विभिन्न प्रकार की सुविधाओं एवं सब्सिडी का लाभ उठाते हैं, वहीं आम कर्मचारी और शिक्षक वर्ग को लगातार उपेक्षित किया जा रहा है। यह दोहरी नीति न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के भी विरुद्ध है।
संघ ने विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। हपुटवा के अनुसार, कार्यकारी परिषद, जो कि विश्वविद्यालय की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है, अब अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है और एक राजनीतिक अड्डे के रूप में परिवर्तित गई है। यहाँ लिए जा रहे निर्णय न तो शिक्षकों के हित में हैं और न ही विश्वविद्यालय के समग्र विकास के लिए सहायक हैं।
डॉ. व्यास ने कहा कि कार्यकारी परिषद को चाहिए कि वह विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गरिमा, पारदर्शिता और निष्पक्षता को बनाए रखते हुए निर्णय ले, न कि राजनीतिक दबावों के तहत कार्य करे। यदि यही स्थिति बनी रही, तो इसका दूरगामी दुष्परिणाम विश्वविद्यालय की साख और शैक्षणिक वातावरण पर पड़ेगा।
हपुटवा ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि CAS की लंबित मांगों को शीघ्र पूरा नहीं किया गया और कर्मचारियों के हितों के विरुद्ध लिए जा रहे निर्णयों को वापस नहीं लिया गया, तो संघ व्यापक आंदोलन शुरू करने के लिए बाध्य होगा। इस आंदोलन में प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के शिक्षक सक्रिय रूप से भाग लेंगे।
संघ ने प्रदेश सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की है कि:
1. CAS के अंतर्गत लंबित पदोन्नतियों को तत्काल प्रभाव से बहाल किया जाए।
2. ए एवं बी श्रेणी के कर्मचारियों के वेतन से की जा रही 3 प्रतिशत कटौती को तुरंत वापस लिया जाए।
3. शिक्षकों के लंबित वित्तीय लाभ, जैसे डीए एवं अन्य भत्तों का शीघ्र भुगतान किया जाए।
4. विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त कर उसकी स्वायत्तता सुनिश्चित की जाए।
अंत में, डॉ. नितिन व्यास ने कहा कि हपुटवा शिक्षकों के अधिकारों और विश्वविद्यालय की गरिमा की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और किसी भी स्थिति में अपने संघर्ष से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने प्रदेश के सभी शिक्षकों से एकजुट होकर इस संघर्ष में भाग लेने का आह्वान किया।
