पूर्व शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज की सुख्खू सरकार को दो टूक चेतावनी- ज्ञान, शोध और लोकतंत्र की आत्मा समझे जाने वाले विश्विद्यालयों को डिग्री बांटने की दुकान समझने का दुस्साहस न करे सरकार
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ (HPUTWA) के तत्वावधान में गुरुवार को शिमला में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और शैक्षणिक स्वतंत्रता की रक्षा हेतु एक वृहद सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में प्रदेश के सभी छह विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधियों, जाने-माने शिक्षाविदों, शिक्षकों तथा गैर-शिक्षक कर्मचारी संगठनों ने एकजुट होकर अपनी हुंकार भरी।
सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हिमाचल प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज ने कड़े शब्दों में कहा कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री बांटने की दुकान नहीं हैं, बल्कि यह ज्ञान, शोध और लोकतंत्र की आत्मा हैं। उन्होंने कहा, “विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इन्हें अपनी शैक्षणिक नीतियों, शोध और संस्थागत निर्णयों में पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और किसी भी तरह का बाहरी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होगा।”
कार्यक्रम में विशेष रूप से शामिल हुए विधायक रणधीर शर्मा ने भी उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर बल देते हुए कहा कि प्रत्येक विश्वविद्यालय की अपनी अकादमिक परंपरा और पहचान होती है। स्वायत्तता बने रहने पर ही संस्थान शिक्षा, शोध और नवाचार में वास्तविक योगदान दे सकते हैं।
राजभवन मार्च की चेतावनी सम्मेलन में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (शिमला), सरदार पटेल विश्वविद्यालय (मंडी), चौधरी सरवन कुमार कृषि विश्वविद्यालय (पालमपुर), और डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय (नौणी) सहित सभी छह विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधियों ने एक स्वर में चेतावनी दी कि यदि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और प्रशासनिक स्वतंत्रता से छेड़छाड़ की गई, तो पूरा शिक्षक समुदाय राजभवन तक पैदल मार्च करेगा।
इस अवसर पर सरदार पटेल विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति प्रो. देव दत्त शर्मा तथा HPU एलुमनाई एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रो. चंद्रमोहन परशीरा ने भी अपने विचार साझा किए।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. जोगिंदर सकलानी, डॉ. अंजलि शर्मा और डॉ. राजेश शर्मा ने किया, जबकि अंत में HPUTWA के सचिव डॉ. अंकुश भारद्वाज ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। सम्मेलन का सर्वसम्मति से यही संदेश रहा कि स्वायत्तता का संरक्षण केवल प्रशासनिक अधिकार नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों की आधारशिला है।
