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ग़ैर मुमकिन है कि हालात की गर्दिश से डरूं,मैंने हर दौर में जीने की क़सम खाई है, इसी जज़्बे से फिर जनसेवा में डटेंगे जी.एस. तोमर

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मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है,पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है। गिरे तो क्या हुआ, फिर उठेंगे और लड़ेंगे ,ये तो एक सफ़र है, कोई आख़िरी मुक़ाम नहीं। हरिवंश राय जी की ये पंक्तियां युवा नेता जी.एस.तोमर पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं । सुशिक्षित और जुझारू युवा तोमर को पूर्व मुख्यमंत्री और राजनीति के वटवृक्ष कहलाए जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस के दिग्गज नेता स्व.वीरभद्र सिंह बहुत पहले पहचान चुके थे । अपने इलाक़े को आगे ले जाने की ज्वाला को भांप कर उन्होंने कई मर्तबा अपने अंदाज में सरेआम कहा था अरे तोमर पत्रकारिता में जो आपको कर्णावत व्व कर चुके हो अब अपना रास्ता समाज सेवा की तरफ मोड़ दो । इसे भाग्य का ही खेल समझो या तोमर की किस्मत कि जब तक वे अपना रास्ता बदलते तब तक उस हीरे को पहचानने वाला जौहरी ही इस लोक को अलविदा कह गया । खैर नियति के आगे कब किसकी चली है लेकिन देर आए दुरुस्त आए । जी.एस. तोमर ने आखिर समाज सेवा का रास्ता लोकतंत्र की सबसे छोटी मगर सबसे मजबूत इकाई ग्राम पंचायत को चुना । शुरुआत में भले ही तोमर को अपने हल्के का नेतृत्व करने का मौका न मिला हो लेकिन ये भी इतना तो समझते हैं कि जरूरी नहीं कि आगाज़ कुछ कमजोर रहा हो तो अंजाम भी कमजोर ही रहेगा । तोमर तो उस मिट्टी के बने हैं जिनका अंदाज़ कुछ इस तरह का है कि “गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले

आंजभोज क्षेत्र में जनसेवा, सामाजिक सरोकार और साफ-सुथरी राजनीति के लिए पहचाने जाने वाले जी. एस. तोमर आज भी लोगों के बीच सम्मान और विश्वास का प्रतीक बने हुए हैं। मीडिया जगत और राज्य स्तरीय राजनीति में अपनी अलग पहचान रखने वाले जी. एस. तोमर ऐसे परिवार से संबंध रखते हैं, जिसने वर्षों तक केवल टोंरु गांव ही नहीं बल्कि पूरे आंजभोज क्षेत्र को अपनी सेवाओं और समर्पण से मजबूत किया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि स्वर्गीय एस. एस. तोमर, के. एस. तोमर और अब जी. एस. तोमर ने हमेशा समाज सेवा को अपना धर्म माना। इस परिवार ने कभी भी जनसेवा को लाभ या राजनीतिक स्वार्थ की दृष्टि से नहीं देखा, बल्कि लोगों की भलाई और क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता दी।
गांव के वरिष्ठ नागरिकों, बुद्धिजीवियों और आम जनता के आग्रह पर जी. एस. तोमर ने अपने जीवन का पहला प्रत्यक्ष चुनाव लड़ा। हालांकि उन्हें इस चुनाव में सफलता नहीं मिली, लेकिन क्षेत्र की जनता का मानना है कि इस चुनाव ने उनकी ईमानदार छवि और साफ राजनीति को और मजबूत किया। चुनावी अनुभव ने उन्हें यह भी सिखाया कि कठिन समय में वास्तव में कौन साथ खड़ा रहता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जी. एस. तोमर में राजनीति के लिए आवश्यक साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प की कोई कमी नहीं है। इतिहास भी इस बात का गवाह है कि कई बड़े नेता अपने शुरुआती चुनावों में सफल नहीं हो पाए, लेकिन उन्होंने हार को अंत नहीं माना। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Abraham Lincoln का उदाहरण देते हुए लोग कहते हैं कि शुरुआती असफलता भविष्य की बड़ी सफलता का रास्ता भी बन सकती है।
आंजभोज क्षेत्र की जनता आज भी जी. एस. तोमर से भविष्य में बड़ी उम्मीदें रखती है। लोगों का मानना है कि उनकी साफ छवि, स्पष्ट सोच और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता उन्हें आने वाले समय में राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में नई पहचान दिला सकती है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि राजनीति में ऐसे ईमानदार और जनसेवा के लिए समर्पित लोगों की हमेशा आवश्यकता रहेगी।

गिरे तो क्या हुआ, फिर उठेंगे और लड़ेंगे,

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